आजतक के खास कार्यक्रम 'एजेंडा आजतक' में केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने राफेल डील को लेकर कांग्रेस सरकार पर कई आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि राफेल का मुद्दा उठाने के लिए कांग्रेस को सुपारी दी गई है. राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे पर कांग्रेस सवाल उठा रही है. यह सुनियोजित साजिश है. हालांकि, सुपारी कहां से मिली है? इस सवाल पर नकवी ने कहा कि यह देश की जनता जानती है और लोकसभा चुनाव में जनता इसका जवाब देगी.
नकवी ने कहा कि कांग्रेस हर रोज हमारे सरकार के खिलाफ झूठे आरोप लगाती रही है. कभी अवॉर्ड वापसी, कभी कह दिया देश में असहिष्णुता है, तो कभी किसानों का मुद्दा उठा दिया. यह लोग कहते हैं कि हमने बोफोर्स उठाया था. हमने बोफोर्स नहीं उठाया. आपके रक्षामंत्री वीपी सिंह ने वह मामला उठाया था. राफेल की तारीफ सेना के उच्च अधिकारी कर चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट यह मान चुका है कि इस डील में कोई धांधली नहीं हुई है. घोटालों का परिवार आज बेचैन और हताश है.
नकवी के बयान पर कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि अगर हम सुपारी लेते तो बीजेपी सत्ता में नहीं आती है. इनको हर चुनाव में पाकिस्तान की याद आती है. इनके बीजेपी अध्यक्ष कहते हैं कि कांग्रेस जीतेगी तो पाकिस्तान में पटाखे फोड़े जाएंगे. इनको अपने सरकार के कामों को गिनाना चाहिए. अभी तक काला धन नहीं आया. दरअसल, इन्होंने कोई काम ही नहीं किया. इन्होंने पूरे कार्यकाल के दौरान लव जिहाद, गाय का मुद्दा जैसा मामला उठाया. बीजेपी ने देश की दिशा बदल दी. देश का मध्य वर्ग बर्बाद हो गया. नोटबंदी, जीएसटी को लेकर यह जवाब नहीं दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार देश में नफरत फैलाना चाहती है.
कांग्रेस के रवैए से बच निकले गुनहगार
एजेंडा आजतक के तीसरे सत्र 'एक खिलाड़ी सब पर भारी' में केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी, कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी, लोजपा सांसद चिराग पासवान, सीपीआई (एम) के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने कई मुद्दों पर चर्चा की. इस दौरान मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि 1984 के दोषियों को सजा मिलनी चाहिए थी, लेकिन कांग्रेस सरकार के लचर रवैए से गुनहगार लोग छूटने में सफल रहे हैं. हमारे सरकार में अब लोगों को न्याय मिल रहा है.
इसका जवाब देते हुए राशिद अल्वी ने कहा कि बीजेपी को सिर्फ कांग्रेस का दाग नजर आता है. बीजेपी के अंदर गुनहगारों को पनाह मिली है. अमित शाह समेत कई नेताओं के खिलाफ बीजेपी ने कोई कार्रवाई नहीं की है. राशिद ने कहा कि लचर रवैया तो बीजेपी ने सुप्रीम कोर्ट को गलत दस्तावेज देकर दिखाया है.
Monday, December 17, 2018
Tuesday, December 11, 2018
荷赛金奖得主镜头下的中国变迁
作者 董婧佳
“在我的镜头里,这三十几年中,赶上了一波接一波的改革开放浪潮。”两届荷赛奖得主、长江韬奋奖获得者、中国新闻社原摄影部主任贾国荣近日接受记者专访,将记录在他镜头里的中国改革开放以来的难忘瞬间娓娓道来。
邓小平的欢迎之手
在贾国荣的众多新闻摄影作品中,有一张尤其令人疑惑:邓小平高高伸出手臂,却无人与他相握。“那是1988年,时任美国国务卿舒尔茨访华,邓小平与访华团一行握过手后,依然站在原地伸着手。”贾国荣回忆说,在舒尔茨告知已经没有团员了之后,邓小平却毅然往前走了两步,始终伸着欢迎之手。“原来在远处还有两位美国随团警卫人员,两人笑着走上前,邓小平在一片欢笑声中与他们一一握手。”
上世纪80年代,我进入外事新闻采访,最直观的感觉是,改革开放的开明、多元化精神在领导人身上体现得很明显。”贾国荣说,比如邓小平每次出场会见宾客前,都会先笑着向记者招手,“大国领导人的朴实与宽广尽在细节之中”。
“我与小平登上《人民日报》头版”
习惯了做记录者的贾国荣,没想到有一天自己和领导人的合照会登上《人民日报》头版。1989年11月13日,邓小平在人民大会堂最后一次正式会见外宾。“我们记者向毛毛(邓小平女儿邓蓉)提出想在会见后和小平同志拍张合影留念,没想到小平同志爽快答应。”贾国荣说,得到应允后,几位女记者赶忙去化妆间整理,他自己则把2台相机都换上新胶卷,调试好闪光灯。
令贾国荣没想到的是,这次合影竟然登上了第二天《人民日报》的头版,“在正中位置加框刊登了这张照片,这在中国新闻史上是第一次正式刊出领导人与记者合影的新闻照片。后来据人民日报的记者说,编辑部接到了很多电话,赞扬报道生动活泼,展现了领导人亲民的作风,令人敬佩”。
“汪辜会谈”其实握了4次手
1993年,“汪辜会谈”在新加坡举行,贾国荣随团采访。会谈当天,两岸代表各约10人相对而坐,记者们则在谈判桌两头的隔栏外各形成了一两百人的拍摄团队。双方坐定后,位居正中的汪道涵、辜振甫两位先生起身,隔桌微笑握手。
“这一握就停不下来了。”贾国荣笑着说,记者们不停高呼“好,再来一次!”使得两位先生先后朝两个方向一共握了4次才“收手”。“这也恰恰反映了这次新闻事件的重要性,两岸关系就是在这次握手之后渐渐畅通。
“在我的镜头里,这三十几年中,赶上了一波接一波的改革开放浪潮。”两届荷赛奖得主、长江韬奋奖获得者、中国新闻社原摄影部主任贾国荣近日接受记者专访,将记录在他镜头里的中国改革开放以来的难忘瞬间娓娓道来。
邓小平的欢迎之手
在贾国荣的众多新闻摄影作品中,有一张尤其令人疑惑:邓小平高高伸出手臂,却无人与他相握。“那是1988年,时任美国国务卿舒尔茨访华,邓小平与访华团一行握过手后,依然站在原地伸着手。”贾国荣回忆说,在舒尔茨告知已经没有团员了之后,邓小平却毅然往前走了两步,始终伸着欢迎之手。“原来在远处还有两位美国随团警卫人员,两人笑着走上前,邓小平在一片欢笑声中与他们一一握手。”
上世纪80年代,我进入外事新闻采访,最直观的感觉是,改革开放的开明、多元化精神在领导人身上体现得很明显。”贾国荣说,比如邓小平每次出场会见宾客前,都会先笑着向记者招手,“大国领导人的朴实与宽广尽在细节之中”。
“我与小平登上《人民日报》头版”
习惯了做记录者的贾国荣,没想到有一天自己和领导人的合照会登上《人民日报》头版。1989年11月13日,邓小平在人民大会堂最后一次正式会见外宾。“我们记者向毛毛(邓小平女儿邓蓉)提出想在会见后和小平同志拍张合影留念,没想到小平同志爽快答应。”贾国荣说,得到应允后,几位女记者赶忙去化妆间整理,他自己则把2台相机都换上新胶卷,调试好闪光灯。
令贾国荣没想到的是,这次合影竟然登上了第二天《人民日报》的头版,“在正中位置加框刊登了这张照片,这在中国新闻史上是第一次正式刊出领导人与记者合影的新闻照片。后来据人民日报的记者说,编辑部接到了很多电话,赞扬报道生动活泼,展现了领导人亲民的作风,令人敬佩”。
“汪辜会谈”其实握了4次手
1993年,“汪辜会谈”在新加坡举行,贾国荣随团采访。会谈当天,两岸代表各约10人相对而坐,记者们则在谈判桌两头的隔栏外各形成了一两百人的拍摄团队。双方坐定后,位居正中的汪道涵、辜振甫两位先生起身,隔桌微笑握手。
“这一握就停不下来了。”贾国荣笑着说,记者们不停高呼“好,再来一次!”使得两位先生先后朝两个方向一共握了4次才“收手”。“这也恰恰反映了这次新闻事件的重要性,两岸关系就是在这次握手之后渐渐畅通。
Monday, December 10, 2018
पबजी-फोर्टनाइट की लत, 2 साल में 3 गुना बढ़े गेमिंग रोगी
बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस परिसर में शट क्लीनिक में तीन-चार बच्चे माता-पिता के साथ आए हैं। डॉक्टर के केबिन में विशाल बैठा है। डॉक्टर विशाल से पूछते हैं कि उसके कितने दोस्त हैं। वह पूछता है- ऑनलाइन या ऑफलाइन? ऑनलाइन 500 से ज्यादा, जबकि ऑफलाइन दो-तीन।
विशाल ने बताया कि वह रोज 9 घंटे पबजी खेलता है। विशाल की तरह पबजी व फोर्टनाइट जैसे गेम्स की लत के शिकार तेजी से बढ़ रहे हैं। भास्कर के सर्वे में यह सामने आया है कि 68% बच्चे कोई न कोई गेम खेल रहे हैं। देश में 22 करोड़ से ज्यादा गेमर्स हैं। बच्चे 14 घंटे तक मोबाइल गेम्स में बिता रहे हैं।
शट (सर्विसेस फॉर हेल्दी यूज़ ऑफ टेक्नोलाॅजी) क्लीनिक के प्रो. डॉ. मनोज कुमार शर्मा कहते हैं सबसे बड़ी चुनौती तो यह होती है कि ज्यादातर केसों में बच्चे मानते ही नहीं हैं कि वे बीमार हैं। हमें वर्ष 2013 से इस बीमारी से संबंधित मरीज लगातार मिलना शुरू हुए। वर्ष 2016 में जब से इंटरनेट सस्ता हुआ है ऐसे मरीजों की संख्या में तीन गुना वृद्धि हो गई है। अभी सर्वाधिक केस पबजी के ही आ रहे हैं। 12 से 23 वर्ष के उम्र तक के युवा हमारे पास आ रहे हैं।
प्रो. डॉ. मनोज कुमार शर्मा कहते हैं कि हर सप्ताह तीन से चार नए मरीज हमारे पास आते हैं। दवाओं के अलावा ऐसे बच्चों के इलाज के लिए 8 से 25 काउंसलिंग सेशन लेने पड़ रहे हैं।
क्लीनिक की सीनियर रिसर्च फेलो अश्विनी तडपत्रिकर कहती हैं कि हमारे पास ऐसे केस भी आते हैं जिसमें बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी बंद हो जाती है। न सिर्फ सोशल लाइफ खत्म हो रही है बल्कि वे नहा भी नहीं रहे हैं, खा भी नहीं रहे हैं। रात-रात भर सोते भी नहीं हैं। दिन में सोते हैं, स्कूल नहीं जाते हैं- स्कूल जाते भी हैं तो वहां ऊंघते रहते हैं। अगर कोई दोस्त भी आता है तो उसके साथ भी पबजी खेलते हैं।
तडपत्रिकर कहती हैं कि हमारे पास सबसे ज्यादा केस न्यूक्लियर फैमिली या जिनके माता-पिता दोनों नौकरी कर रहे हैंं उनके परिवारों से आते हैं। बच्चा सिंगल चाइल्ड है तब भी ऐसे केसेस सामने आते हैं। शुरुआत में पैरेंट्स बच्चों को तकनीक सिखाते हैं और एक्सपोजर के नाम पर फिर बच्चे मोबाइल का ज्यादा प्रयोग करने लगते हैं। गेमिंग की शुरुआत में फन, मनोरंजन, जीतने के लिए और टाइम पास के लिए टीनएजर्स जुड़ते हैं।
विशाल ने बताया कि वह रोज 9 घंटे पबजी खेलता है। विशाल की तरह पबजी व फोर्टनाइट जैसे गेम्स की लत के शिकार तेजी से बढ़ रहे हैं। भास्कर के सर्वे में यह सामने आया है कि 68% बच्चे कोई न कोई गेम खेल रहे हैं। देश में 22 करोड़ से ज्यादा गेमर्स हैं। बच्चे 14 घंटे तक मोबाइल गेम्स में बिता रहे हैं।
शट (सर्विसेस फॉर हेल्दी यूज़ ऑफ टेक्नोलाॅजी) क्लीनिक के प्रो. डॉ. मनोज कुमार शर्मा कहते हैं सबसे बड़ी चुनौती तो यह होती है कि ज्यादातर केसों में बच्चे मानते ही नहीं हैं कि वे बीमार हैं। हमें वर्ष 2013 से इस बीमारी से संबंधित मरीज लगातार मिलना शुरू हुए। वर्ष 2016 में जब से इंटरनेट सस्ता हुआ है ऐसे मरीजों की संख्या में तीन गुना वृद्धि हो गई है। अभी सर्वाधिक केस पबजी के ही आ रहे हैं। 12 से 23 वर्ष के उम्र तक के युवा हमारे पास आ रहे हैं।
प्रो. डॉ. मनोज कुमार शर्मा कहते हैं कि हर सप्ताह तीन से चार नए मरीज हमारे पास आते हैं। दवाओं के अलावा ऐसे बच्चों के इलाज के लिए 8 से 25 काउंसलिंग सेशन लेने पड़ रहे हैं।
क्लीनिक की सीनियर रिसर्च फेलो अश्विनी तडपत्रिकर कहती हैं कि हमारे पास ऐसे केस भी आते हैं जिसमें बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी बंद हो जाती है। न सिर्फ सोशल लाइफ खत्म हो रही है बल्कि वे नहा भी नहीं रहे हैं, खा भी नहीं रहे हैं। रात-रात भर सोते भी नहीं हैं। दिन में सोते हैं, स्कूल नहीं जाते हैं- स्कूल जाते भी हैं तो वहां ऊंघते रहते हैं। अगर कोई दोस्त भी आता है तो उसके साथ भी पबजी खेलते हैं।
तडपत्रिकर कहती हैं कि हमारे पास सबसे ज्यादा केस न्यूक्लियर फैमिली या जिनके माता-पिता दोनों नौकरी कर रहे हैंं उनके परिवारों से आते हैं। बच्चा सिंगल चाइल्ड है तब भी ऐसे केसेस सामने आते हैं। शुरुआत में पैरेंट्स बच्चों को तकनीक सिखाते हैं और एक्सपोजर के नाम पर फिर बच्चे मोबाइल का ज्यादा प्रयोग करने लगते हैं। गेमिंग की शुरुआत में फन, मनोरंजन, जीतने के लिए और टाइम पास के लिए टीनएजर्स जुड़ते हैं।
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