बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस परिसर में शट क्लीनिक में तीन-चार बच्चे माता-पिता के साथ आए हैं। डॉक्टर के केबिन में विशाल बैठा है। डॉक्टर विशाल से पूछते हैं कि उसके कितने दोस्त हैं। वह पूछता है- ऑनलाइन या ऑफलाइन? ऑनलाइन 500 से ज्यादा, जबकि ऑफलाइन दो-तीन।
विशाल ने बताया कि वह रोज 9 घंटे पबजी खेलता है। विशाल की तरह पबजी व फोर्टनाइट जैसे गेम्स की लत के शिकार तेजी से बढ़ रहे हैं। भास्कर के सर्वे में यह सामने आया है कि 68% बच्चे कोई न कोई गेम खेल रहे हैं। देश में 22 करोड़ से ज्यादा गेमर्स हैं। बच्चे 14 घंटे तक मोबाइल गेम्स में बिता रहे हैं।
शट (सर्विसेस फॉर हेल्दी यूज़ ऑफ टेक्नोलाॅजी) क्लीनिक के प्रो. डॉ. मनोज कुमार शर्मा कहते हैं सबसे बड़ी चुनौती तो यह होती है कि ज्यादातर केसों में बच्चे मानते ही नहीं हैं कि वे बीमार हैं। हमें वर्ष 2013 से इस बीमारी से संबंधित मरीज लगातार मिलना शुरू हुए। वर्ष 2016 में जब से इंटरनेट सस्ता हुआ है ऐसे मरीजों की संख्या में तीन गुना वृद्धि हो गई है। अभी सर्वाधिक केस पबजी के ही आ रहे हैं। 12 से 23 वर्ष के उम्र तक के युवा हमारे पास आ रहे हैं।
प्रो. डॉ. मनोज कुमार शर्मा कहते हैं कि हर सप्ताह तीन से चार नए मरीज हमारे पास आते हैं। दवाओं के अलावा ऐसे बच्चों के इलाज के लिए 8 से 25 काउंसलिंग सेशन लेने पड़ रहे हैं।
क्लीनिक की सीनियर रिसर्च फेलो अश्विनी तडपत्रिकर कहती हैं कि हमारे पास ऐसे केस भी आते हैं जिसमें बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी बंद हो जाती है। न सिर्फ सोशल लाइफ खत्म हो रही है बल्कि वे नहा भी नहीं रहे हैं, खा भी नहीं रहे हैं। रात-रात भर सोते भी नहीं हैं। दिन में सोते हैं, स्कूल नहीं जाते हैं- स्कूल जाते भी हैं तो वहां ऊंघते रहते हैं। अगर कोई दोस्त भी आता है तो उसके साथ भी पबजी खेलते हैं।
तडपत्रिकर कहती हैं कि हमारे पास सबसे ज्यादा केस न्यूक्लियर फैमिली या जिनके माता-पिता दोनों नौकरी कर रहे हैंं उनके परिवारों से आते हैं। बच्चा सिंगल चाइल्ड है तब भी ऐसे केसेस सामने आते हैं। शुरुआत में पैरेंट्स बच्चों को तकनीक सिखाते हैं और एक्सपोजर के नाम पर फिर बच्चे मोबाइल का ज्यादा प्रयोग करने लगते हैं। गेमिंग की शुरुआत में फन, मनोरंजन, जीतने के लिए और टाइम पास के लिए टीनएजर्स जुड़ते हैं।
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